top of page

This website has been started to share Poems and Articles Related to
Umesh Dobhal

465146439_10226289501047797_8590435187454370212_n_edited.jpg

सोचो मेरा क्या होगा

दिन जमाने को दे दिया रात तो मेरी रहने दो अश्क थमे हैं आंखों में रात को इनको बहने दो तुमने जो मांगा हमने दिया है बस अंधेरा रहने दो जब सब...

हर जगह मौजूद है मां

असमय बूढ़ी हो गई है मां की उम्र के बांज की शाखाओं से खुरदरे हाथ कितने स्नेहिल हैं बेटी-बेटों व नाती-पोतों के लिए उनके लिए कितना जवान है...

महत्वाकांक्षा

चिड़िया आसमान की बुलन्दियों को छूना चाहती है डैनो के मजबूत होते ही चिड़िया घोंसला छोड़ देती है चाहता हूं- चिड़िया की तरह पहाड़ियों के पार...

लड़ रहा हूं

अंधेरे से लड़ रहा हूं मैं अपने आप से लड़ रहा हूं चांद तारे छुप गये हैं बादलों में मैं अंधेरे को चीरता पग-पग बढ़ता जा रहा हूं बरस रहा...

उदास बसन्त

रात बीत जायेगी फिर सवेरा होगा कल मनायेंगे बसन्त सूरज को आना ही है रोशनी में बतियायेंगे पत्तों से पेड़ों में फूल पगडंडी पर खुशबू लदी है...

याद

पेड़ों ने पहन ली हैं सफेद टोपियां बर्फ क्या गिरी हिमालय और पास आ गया और तुम्हारी याद भी जिसका बचपन बर्फ के गोले दागने में बीता है वह मैं...

सूरज मेरा आराध्य है

सरल बातें जो रोज घटती हैं अक्सर सरल नहीं होती सूरज रोशनी देता है दिन भर एक चमकदार रोशनी अंधेरे से जूझते इंसानों का पथ प्रदर्शक है सूरज...

चेहरे उदास क्यों हैं

फिर हवाओं ने छेड़ दिये हैं गीत आंगन गमक गया है अन्न की सुगन्ध से आसमान में कुलांचे भरने लगे हैं परिन्दे गांव उतर गये हैं खेतों में गुलाबी...

ये बच्चे मेरे गांव के

बच्चे बड़े होना चाहते हैं आस-पास देखते हुए वे झटपट बड़ा हो जाना चाहते हैं खेतों में मिट्टी से खेलते बच्चे हल की मूठ पकड़ना चाहते हैं...

पहाड़ी औरत

उसका बचपन मां के संग खेतों में बीता अपनी उम्र और शरीर से ज्यादा काम करते हुए उसके खेल डंगर, दरान्ती, मिट्टी और घास के गट्ठर थे इन्हीं के...

ठिठुरते हुए भी

जिनका कोई नहीं है न ठौर और ना ही ठिकाना उनका भगवान है ठंड से ठिठुरते इस शहर में यही पढ़ाया गया है हमें पीढ़ियों से रटे इस ज्ञान को आने...

कौन कहां रह गया

शहर में सांझ तक निरूद्देश्य भटकता रहा सांस टूटने की चटख तीर सी बिंध गई लो आज का दिन भी दूर से अलविदा कह गया क्या पता जीवन की दौड़ में कौन...

पेड़, हरियाली और सड़क

गाड़ी सड़क पर.दौड़ रही है यहां एक जंगल था हरा-भरा और दृष्टिपथ तक फैलता हुआ और एक नदी थी तस्वीरें उभर रही हैं कई पहाड़ियों को पीछे छोड़कर...

अमृत बरसा

पहाड़ियों को चूमकर सूरज आंगन तक क्या आया खेतों में पानी से भरी थालियां चांदी सी चमकने लगी बर्फ से ढकी चोटियां शरमाई और दुल्हन के मुख सी...

रात भर

सांय-सांय करते भग्न अवशेष किसी के साकार हुए स्वप्नों की परिणति निज उर में नितान्त निजी शोभा समेटे है इन्हें सिर्फ तुम्ही दुलारना छूटती है...

धूप भी तो छांव भी है जिन्दगी

जिधर उड़ाया उड़ गये धूप भी तो छांव भी है जिन्दगी गांव में क्या रुकी एम्बेसडर नई शीशों को छूते बच्चे हो गई जिन्दगी मल्यो' की डार से स्वप्न...

वहां तुम हो

आंगन चिड़ियों का भी है और बुरकती नवजात दुर्गी बछिया का भी आंगन के चप्पे-चप्पे पर चस्पां हैं यादों के हुजूम आंगन में फैलाये गये अनाज के...

आदमी होकर जीने की तकलीफ

तकलीफ सच ! तकलीफ यही है आदमी होकर जीने की तकलीफ पूंजी के गर्भ से जन्मी अव्यवस्थित होड़ में शरीक होने की मजबूरी मजबूरी समृद्ध होकर आदमी...

कितनी तृष्णा थी

सावन में बरसते बादल एकाकार हैं सब न रूप में न रंग में धुंधलके का अहसास धरती और आकाश के मिलन का प्रकम्पन प्रकाशित है वातावरण ओह, कितनी...

बर्फ और संकेत

एक शोर के साथ बच्चे खेल रहे हैं बच्चों का शोर ऐसा पाठ नहीं है कि सूंघा जाय बावजूद इसके कि सी0 आई0 डी0 सूंघ रहे हैं सूंघने को बहुत कुछ है...

Call 

+91-8800825490
+91-9720042404

Email 

Join Us

  • Facebook
bottom of page